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Thursday, August 03, 2023

हिन्दी विश्व सम्मेलन

जो लोग हिन्दी के लिए अपने स्तर पर कार्य करते रहे हैं वे आगे भी करते रहेंगे... उन पर इन सम्मेलनों का प्रभाव नहीं पड़ता है...... हाँ उनके किये गये कार्यों को चालाक लोग अपना कार्य बताकर..... लाभ उठाते रहे हैं और आगे भी उठाते रहेंगे...... हिन्दी फूलेगी भी और फलेगी भी .......
बड़ी आवश्यकता आज इस बात की है कि हमारा लोक लगातार छीज रहा है, तमाम लोक शब्द, लोक मुहावरे, लोकोक्तियाँ, लोक गीत, लोक गाथाएँ...... आदि आदि लोक जीवन से विलुप्त होते जा रहे हैं.... इन्हें न कोई संस्थान सहेजने का प्रयास कर रहा है और न अकादमियाँ.... जब कि सबको पता है कि भाषा की असली शक्ति लोक से ही आती है..... लोक मानव ही भाषा का निर्माता है..... लोक जीवन में अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है.......
क्या कुछ लाख रुपए खर्च करके यह सब संकलित नहीं कराया जा सकता है ? और अनेक हिन्दी प्रेमियों ने, साहित्यकारों ने ऐसी सामग्री अपने स्तर पर संकलित कर रखी है क्या उसे प्रकाशित नहीं कराया जा सकता  है ....... ?

-डा० जगदीश व्योम 

विश्व हिन्दी सम्मेलन

मारिसस में हो रहे विश्व हिन्दी सम्मेलन में मारीसस के लोगों को भी सौ डालर देकर प्रवेश की शर्त पर मारीसस के साहित्यकार रामदेव धुरंधर जी ने प्रश्न उठाया है.....

हिन्दी के उत्थान के लिए, हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए कार्यक्रम हो रहा हो और यह व्यवस्था हो कि जो रुपए देगा वह इसमें आ सकेगा..... लज्जाजनक बात है, हमारा उद्देश्य है कि हिन्दी जन जन तक पहुँचे और जो हिन्दी प्रेमी हैं, हिन्दी से जुड़े हैं उनके लिए दरवाजे बन्द कर दिये जायें कि सौ डालर की चाबी से हिन्दी का दरवाजा खुलेगा..... 
क्या संदेश जाता है बाहर बैठे लाखों हिन्दी प्रेमियों के बीच..... जिस देश में हिन्दी सम्मेलन हो रहा हो वहाँ के हिन्दी प्रेमियों के लिए ऐसी शर्तें अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दी से पलायन की प्रेरणा देने वाली हैं...... यदि किसी देश के हिन्दी प्रेमियों को उसमें शामिल ही नहीं करने की मंशा या मजबूरी है तो फिर उस देश में विश्व हिन्दी सम्मेलन का औचित्य ही क्या रह जाता है ?

यदि हिन्दी प्रेमियों की संख्या को सीमित रखकर कुछ गिने चुने लोगों के बीच बन्द हाल में विचार विमर्श ही करना है तो फिर ऐसे कार्यक्रम भारत में भी किये जा सकते हैं, इतने लोगों को देश से विदेश ले जाकर करोड़ों रुपए खर्च करने का औचित्य क्या है ?

हिन्दी के लिए जितना कार्य अकादमियों और सरकारी संस्थानों आदि ने किया है उससे अस्सी गुना ज्यादा कार्य व्यक्तिगत स्तर पर किये गये हैं..... उन लोगों के लिए श्रद्धा से सिर झुक जाता है जिन्होंने शुरुआती दौर में हिन्दी के लिए शुषा फोंट, युनिकोड फोंट, देव फोंट आदि बनाकर इंटरनेट पर हिन्दी को चलना सिखाया.....

प्रारम्भिक ब्लाग हिन्दी में लिखे, कविता कोश बनाया, हिन्दी विकिपीडिया को सम्मानजनक स्थिति तक पहुँचाया......... अनुभूति जैसी वेबसाइट (हिन्दी साहित्य की पहली व्यवस्थित वेबसाइट) को अपने स्तर पर शुरू करके अब तक अनवरत रूप से संचालित किया ...
इनमें से तमाम हिन्दी प्रेमी वे लोग हैं जो विदेशों में रहकर यह कार्य करते रहे हैं..... इस समारोह में भी अपने पास से लाखों रुपये खर्च करके कई लोग पहुँचे हैं.... उनकी अभिलाषा केवल हिन्दी सम्मेलन में वक्तव्य सुनने और घोषणाएं सुनने की ही नहीं रही हैं वे इस उम्मीद में भी मारिसस गए हैं कि मारिसस के हिन्दी प्रेमी हिन्दी के विषय में क्या सोचते हैं ? वहाँ हिन्दी की क्या स्थिति है ?........

परन्तु जब वहाँ स्थानीय हिन्दी प्रेमी ही नहीं होंगे ( केवल वह होंगे जो सौ डालर देने में समर्थ हैं ) तो फिर वे भी अपने को ठगा हुआ ही महसूस नहीं करेंगे क्या ?

-डा० जगदीश व्योम

Sunday, September 27, 2015

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

सौरभ जी, बात क्या करनी...... बातें तो होती ही रहती हैं...... नवगीत गोष्ठी शुरू कर दीजिये.... देखा देखी कुछ अन्य लोग भी अपने अपने स्तर से ऐसी पहल करने लगेंगे..... हाँ यह ध्यान रखना होगा कि नवगीत गोष्ठियों को मंच के गलेबाजों और दसियों साल से एक दो गीत गाने वालों से बचना चाहिए .....

-डा० जगदीश व्योम
August 26 at 9:43am 

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

क्या अभी ऐसे कुछ लोग हैं जो मंचों पर लोकप्रिय हैं, जिन्होंने मंचों से खूब पैसा भी कमाया है और उनके अन्दर का नवगीतकार अभी तक जिन्दा है ? यदि ऐसे कोई कवि या कवयित्रियाँ हों तो उनके नाम बतायें ......और उनका एक एक प्रतिनिधि नवगीत भी बता दें.....

-डा० जगदीश व्योम
August 25 at 9:36pm

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

हिन्दी संस्थान या अन्य साहित्यिक अकादमियों में जिस तरह की साहित्यिक माफियागीरी और राजनीति व्याप्त है, उनसे नवगीत के लिए कोई उम्मीद करना समय खराब करना ही है.... हमें ही नवगीत और हिन्दी साहित्य के लिए अपने स्तर से ही जो कर सकते हैं वह करना है, नवगीत विमर्श इसी पहल का एक सोपान है....... मेरा निवेदन तो सिर्फ यही है कि ---- " बहते जल के साथ न बह / कोशिश कर के मन की कह " .....

-डा० जगदीश व्योम
August 25 at 9:36am 

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

केवल प्रशंसात्मक बातें ही यहाँ न लिखिये... यह विमर्श का मंच है..... यहाँ पहले से ही नवगीत के इसी सन्दर्भ पर चर्चा हो रही थी और इसी बीच आज यह साक्षात्कार प्रकाशित हुआ जो विमर्श के विषय से जुड़ा हुआ है इसीलिए यहाँ इसे पोस्ट किया गया है..... यदि कुछ छूट गया है तो उस पर भी दृष्टि डालें.... ऐसे और कौन से प्रश्न हो सकते हैं जिन्हें साक्षात्कार लेने वाले को पूछना चाहिए था परन्तु नहीं पूछा गया..... या आपकी दृष्टि से कुछ और बहुत महत्त्वपूर्ण जो छूट रहा हो.......

-डा० जगदीश व्योम
August 24 at 6:24pm 

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

जी सौरभ जी, माहेश्वर तिवारी जी ने प्रकारान्तर से उसी विमर्श को आगे बढ़ाया है इस साक्षात्कार के माध्यम से

-डा० जगदीश व्योम
August 24 at 10:12am

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

== विमर्श 07 ==
माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ है। यश मालवीय के साथ नवगीत पर बात करते हुए माहेश्वर तिवारी ने कहा है कि " कवि सम्मेलन जन से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम है। मैं मंच से कभी पलायन नहीं करूँगा। कुछ गम्भीर कवियों ने मंच को अछूत समझकर कविता का बड़ा अपकार किया है। वैसे आज कवि सम्मेलन की जगह कविता सम्मेलन किए जाने की जरूरत है। जब आप जगह खाली करेंगे तो वह जगह खाली तो रहेगी नहीं, कोई न कोई भांड़, विदूषक या नौटंकीबाज वहाँ काबिज हो जायेगा।"
कहाँ तक सहमत हैं माहेश्वर तिवारी जी की इस बात से कि "कुछ गम्भीर कवियों ने मंच को अछूत समझकर कविता का बड़ा अपकार किया है..."

-डा० जगदीश व्योम

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

किसी रचनाकार के अन्दर की गाँठे ज्यों ज्यों खुलती जाती हैं त्यों त्यों रचनाकार के रूप में उसका कद बढ़ता जाता है, इसलिए मन की गाँठों का खुलना एक रचनाकार के लिए बहुत जरूरी है.... गीत और नवगीत में एक अन्तर यह भी है.... यदि गाँठें लगी हैं तो कम से कम नवगीत को नहीं समझा सकता... नवगीत विमर्श समूह है ही इसलिए कि मन की गाँठे खुल सकें...... और हाँ रमाकान्त ने जो प्रश्न उठाया है उसकी गम्भीरता को धैर्य के साथ समझने की आवश्यकता है यह नवगीत को समझने के लिए भी जरूरी है..... यह केवल एक रमाकान्त का प्रश्न नहीं है सैकड़ों रमाकान्तों का प्रश्न हो सकता है.....
सभी से यह अनुरोध है कि विमर्श को व्यक्तिगत न बनायें...... यहाँ लिखी जाने वाली टिप्पणियाँ न जाने कितने लोग पढ़ रहे हैं ..... इसका ध्यान रखें।

-डा० जगदीश व्योम
July 22 at 7:49am

Friday, September 25, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

यह विमर्श व्यक्तिगत आक्षेप की ओर जा रहा है..... इसे कृपया यहीं बन्द करें...... सभी से अनुरोध है कि विमर्श नवगीत पर केन्द्रित रखें..... व्यक्तिगत टीकाटिप्णी से बचें.....
-डा० जगदीश व्योम
July 13 at 3:39pm 

योगेन्द्र दत्त शर्मा का नवगीत

कठिन समय से सघर्ष करते एक संवेदनशील मनुष्य की पीड़ा को अभिव्यंजित करता नवगीत है...." चाह रहा कुछ और देखना पर कुछ और देखना पड़ता" एक नौकरशाह इन पंक्तियों को अपने मन की पंक्तियाँ भी कह सकता है।

-डा० जगदीश व्योम

Wednesday, September 02, 2015

एक हाथ में हल की मुठिया

जी भारतेन्दु जी, आप गीतों पर जैसी पैनी दृष्टि रखते हैं वह अनुकरणीय है..... राघव जी के विषय में मेरे पास और जानकारी नहीं है...... यह संग्रह मेरे पास है... खोजता हूँ ...... इसी बहाने कुछ चर्चा गीत नवगीत पर होती रहे ....

-जगदीश व्योम
July 4 at 10:19am

एक हाथ में हल की मुठिया

एक बात जो मेरे मन में आ रही है कि कोई अच्छा गीत/नवगीत पाँच दशक या और भी अधिक समय तक अपरिचित बना रहता है यदि उसके रचनाकार को कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिल पाता है अथवा आलोचना के मठाधीशों की कृपा नहीं होती ..... 
दूसरी बात यह कि यदि कोई गीत/नवगीत प्रभावशाली है तो वह कभी न कभी पाठकों की पसंद बन ही जाता है.... गीत का रचनाकार कौन है यह जाने बिना भी..... इस रचना को बिना नाम के होने पर भी नवगीत के वरिष्ठ रचनाकारों ने भरपूर सराहा बिना यह जाने कि यह किसका लिखा हुआ है ..... इस बहाने एक भूला बिसरा नवगीत चर्चा में आ सका... आप सभी का आभार...... 
यह रचना " विश्वनाथ राघव " की है, " धरती के गीत" संग्रह में 1959 में प्रकाशित।

-जगदीश व्योम
July 3 at 5:26am

एक हाथ में हल की मुठिया

जी भारतेन्दु जी... बताता हूँ जल्दी ही...... रमेश रंजक जी का नहीं है..... .

-जगदीश व्योम
July 1 at 9:01pm

एक हाथ में हल की मुठिया

रचनाकार का नाम खोजने का थोड़ा और प्रयास करें... बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन, नईम, दिवाकर वर्मा, गुलाब सिंह, नचिकेता, महेश अनघ ... इनमें से इस गीत का कोई रचनाकार नहीं है

-जगदीश व्योम
July 1 at 3:32pm 

एक हाथ में हल की मुठिया

यह भी एक प्रयोग है... कि क्या किसी रचना की कथ्य, शैली.... से किसी रचनाकार को पहचाना जा सकता है..... क्या हम उन्हीं रचनाकारों को सहजता से पहचान पाते हैं जिनकी रचनाएँ विभिन्न कोर्स की किताबों में आ गई.... थोड़ी माथापच्ची करें तो नाम मिल जायेगा..... देखते हैं कि कौन सही रचनाकार तक पहुँच पाता है.... जो पहले पहुँच पाता है उनके लिए "नवगीत २०१३" पुरस्कार स्वरूप भेजी जायेगी......

-जगदीश व्योम
July 1 at 10:33am

एक हाथ में हल की मुठिया

एक गीत/नवगीत .... क्या कोई बता सकता है कि इसके रचनाकार कौन हैं.... क्या इसे नवगीत कहा जा सकता है ?
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एक हाथ में हल की मुठिया
एक हाथ में पैना
मुँह में तिक-तिक बैल भागते
टालों का क्या कहना
भइ टनन टनन का गहना

सिर पर पाग बदन पर बंडी
कसी जाँघ तक धोती
ढलक रहे माथे से नीचे
बने पसीना मोती
टँगी मूँठ में हलकी थैली
जिसमें भरा चबेना
भइ गुन गुन का क्या कहना

जोड़ी लिए जुए को जाती
बँधा बँधा हल खिंचता
गरदन हिलती टाली बजती
दिल धरती का सिंचता
नाथ-जेबड़े रंग बिरंगे
बढ़िया गहना पहना

भइ सजधज का क्या कहना
गढ़ी पैंड की नोंक जमीं पे
खिंच लकीर बन जाती
उठती मिट्टी फिर आ गिरती
नोंक चली जब जाती
बनी हलाई, हुई जुताई
सुख का सोता बहता
भइ इस सुख का क्या कहना
भइ टनन टनन का गहना

-[यह रचना " विश्वनाथ राघव " की है, " धरती के गीत" संग्रह में 1959 में प्रकाशित]

Saturday, August 29, 2015

हर कविता की इच्छा अन्ततः गीत बन जाना है

"गीत गागर" पत्रिका [सम्पादक दिनेश प्रभात] के अप्रैल-जून २०१५ अंक में नचिकेता द्वारा लिखे गए "केदारनाथ अग्रवाल के गीतों की बनावट और बुनावट" शीर्षक लम्बे लेख की दूसरी कड़ी प्रकाशित की गई है.... नचिकेता जी ने केदारनाथ अग्रवाल के गीतों के बहाने गीत पर महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं.. 
अरुन कमल के कविता विषयक विचार इस लेख में देखें--
" हर कविता की इच्छा अन्ततः गीत बन जाना है। क्योंकि संगीत के सबसे पास का बिन्दु है, दो देहों के बीच बस एक स्पंदित भित्ति तक पहुँचना ही कविता का ध्येय है और श्रेय भी। जहाँ पहुँच कर भाषा बहुत हल्की भारहीन हो जाती है, शब्द अपनी पीठ से सारे माल असबाब, सारे स्थूल अर्थ को छोड़ते हुए, केवल छायाओं-प्रच्छायाओं को, आभासों को वरण करते हुए उस भाव दशा को व्यक्त करते हैं जिसमें पूरी जीवन-स्थिति अन्ततः तिरोहित या स्त्रवित होती है"

-डा० जगदीश व्योम
17 jun, 2015

गीत गागर में नचिकेता का लेख

गीत गागर पत्रिका के अप्रैल-जून २०१५ अंक में नचिकेता द्वारा लिखे गए "केदारनाथ अग्रवाल के गीतों की बनावट और बुनावट" शीर्षक लम्बे लेख की दूसरी कड़ी प्रकाशित की गई है.... नचिकेता जी ने केदारनाथ अग्रवाल के गीतों के बहाने गीत पर महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं.. यह लेख नवगीतकारों को पढ़ना चाहिए.... इस लेख में आपको अपने मन में उठने वाले तमाम प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं..... लेख का एक अंश देखें-
" आज की आधुनिक काव्य-दृष्टि के अनुसार आज की बौद्धिक कविताओं की संरचना जितनी जटिल और उसके अर्थ निर्माण की प्रक्रिया जितनी अबूझ, अमूर्त और अर्थहीन होगी वह उतनी ही श्रेष्ठ कविता होगी। जो कविता पाठकों की समझ में नहीं आयेगी वह प्रभावशाली, कलात्मक और सोद्देश्य क्या खाक होगी ? .... जिस कवि से जनता सीधे संवाद करती हो उसे आज की अबूझ और निरी गद्यात्मक कविता जो व्यापक जन-जीवन से पूरी तरह विस्थापित हो चुकी है, से प्यार कैसे हो सकता है। इसलिए आज की नितान्त जटिल और पहेलीनुमा अबूझ गद्य कविता की वर्तमान स्थित को देखते हुए केदारनाथ अग्रवाल ने क्षुब्ध स्वर में कहा है कि आज-
" कविता को नंगा कर दिया गया है, उसकी रीढ़ तोड़ दी गई है, उसे हर तरह से अपंग कर दिया गया है, उसकी स्वर और ध्वनियाँ छीन ली गईं हैं, उसे भाषायी संकेतबद्धता से वंचित कर दिया गया है, उसे कवि के अचेतन मस्तिष्क में ले जाकर ऊलजलूल में भरपूर भुला-भटका दिया गया है ... अब आज जब सब दफ्तर के बाबू हो गए हैं.. छोटे-बड़े नगरों में खोये हुए और खाये गए हैं.. जनता से कट-कटा चुके हैं.. बोलने में बुदबुदाते हैं... लिखने को कविता लिखते हैं, मगर कविता नहीं लिवर लिखते हैं, नये-नये वाद-विवाद के चक्कर में डालडा के खाली डिब्बे पीटते हैं... करते कुछ नहीं, काफी हाउस में बकवास करते हैं.. पराये ( विदेशी कविता) की नकल में अकल खर्च करते हैं... और कविता को अपनी तरह बेजान बनाते हैं.. भाषा को चीर-फाड़ कर चिथड़े-चिथड़े कर देते हैं।" (गीत गागर, पृष्ठ 44)
[केदारनाथ अग्रवाल के गद्यात्मक कविता पर उनके इन विचारों से आप कहाँ तक सहमत हैं ]

-डा० जगदीश व्योम

डा० जगदीश व्योम

"गीत का आज के तकाजों और सरोकारों से जुड़ा होना ही नवगीत होना है। प्रत्येक नवगीत अनिवार्यतः एक गीत पहले होता है किन्तु हर गीत को नवगीत नहीं कहा जा सकता। "

- देवेन्द्र शर्मा इन्द्र