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Friday, September 25, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

नवगीत में नवता - गेयता दो अपरअधिकार िहार्य तत्व होने चाहिए। वे दोनों इस नवगीत में हैं. नवगीत का कथ्य चौंकाता है चूंकि अब तक यह प्रवृत्ति कम रचनाओं में सामने आई है. अपने सेवाकाल में कितने ही विधायक पतियों, सरपंच पतियों और पार्षद पतियों से सामना हुआ है. अपनी ही पत्नी से उसके पद के अधिकार संविधानेतर तरीकों से छीन लेना, पत्नी के पद की सरकारी मुहर अपनी जेब में रखना, उसके हस्ताक्षरों के जगह खुद हस्ताक्षर करना और उसकी जगह खुद बैठक में पहुँच जाना इस युग का सत्य है. इस प्रवृत्ति के विरुद्ध प्रधान मंत्री भी बोल चुके हैं. तुलसी के अनुसार प्रभुता मद काहि मद नाहीं …। अपने अधिकारों की रक्षा हेतु गुहार लगानेवाला अन्यों के अधिकार छीनने लगे यह कैसे स्वीकार्य हो? नवगीत में कहीं किसी पर कोई आक्षेप नहीं है. तथाकथित शोषितों द्वारा सत्ता मिलते ही अपने ही वर्ग के कमजोर लोगों का शोषण न्ययोचित कैसे माना जाए? नवगीत को दुर्बलतम के हित में खड़ा होना ही चाहिए.
-संजीव वर्मा सलिल
July 14 at 10:23am 

Wednesday, September 02, 2015

एक हाथ में हल की मुठिया

जमीन से जुड़ा सार्थक नवगीत. कॉंवेंटी मस्तिष्क इसका रसास्वादन नहीं कर सकते, यह उनका दुर्भाग्य है

-संजीव वर्मा सलिल
July 1 at 10:16am