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Sunday, September 27, 2015

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

नवगीत के लिए समानांतर मंच की आवश्यकता है जिसमे तथाकथित विदूषको की कोई जगह न हो।जहां गंभीर विमर्श हो।2004 मे आगरा की नवगीत गोष्ठी मे मैने सोमठाकुर जी से पूछा था कि नवगीत दशको का विमर्श क्यो नही कराते..वे उनदिनो हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष थे।मंच पर तिवारी जी भी थे यश मालवीय भी थे राजेन्द्र गौतम ,बुद्धिनाथ मिश्र आदि अनेक नवगीतकार भी थे सबने सहमति दी थी स्वीकार किया गया -सस्थान से किसी को यह कार्य सौपने की बात भी हुई लेकिन ..फिर सब खतम .. सोमठाकुर जी नवगीत दशक 1 के रचनाकार हैं उन्हे भी मंच ही खींचता रहा विमर्श नही ।..जो कविता विमर्श के लिए नही है उसकी पाठ्यचर्या क्यो की जाए ?..ऐसे मंचीय कवियो के सरोकार गंगा गये गंगादास जमुना गये जमुना दास हो जाते है।लोगो की नजर मे सब रहता है ..माया और राम दोनो को साधने की कोशिश असंभव है। जिनकी श्र्द्धा मंचीय प्रपंचो से जुडी है वे सच्चे अर्थो मे नवगीत के मित्र नही हो सकते।शंभुनाथ जी के शब्दो मे वे नवगीत के शत्रु हैं।

-भारतेन्दु मिश्र
August 25 at 7:54am 

माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार

तिवारी जी के अपने रचनाधर्म को लेकर अच्छी चर्चा हुई है। नवगीत को लेकर उसके दोहरे संघर्ष को लेकर जिसके वो साक्षी रहे हैं उस पर और बात होती तो अच्छा लगता.उनके समकालीनो को लेकर भी चर्चा होनी चाहिए....इसी प्रकार नवगीत के इतिहास पर कुछ और सवाल हो सकते थे आदरणीय से..अब भाई यश मालवीय ने प्रश्नावली जैसी बनाई हो वैसे ही उत्तर मिलने स्वाभाविक हैं।

-भारतेन्दु मिश्र
August 24 at 6:19pm 

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

भाइयों! पहले ये तय कीजिए कि आप नवगीत पर बहस कर रहे हैं या जाति की सवर्णवादी मानसिकता पर।दोनो का विमर्श अलग अलग रूप/तर्को/उदाहरणो से होना चाहिए।मेरे विचार से खुरपी से दाढी नही बनाई जा सकती और ब्लेड से घास नही छीली जा सकती।तो मेरा मानना है कि पहले तो हम ये तय करें फिर तार्किक ढंग से बात करें।व्यक्तिगत आक्षेप करना उचित नही है।..जहां तक रमाकांत यादव जी का प्रश्न है कि ये गीत सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है..ये सही बात है ..लेकिन ये मानसिकता कवि के साथ नही बल्कि रमधनिया से रामधनी बनने के बीच जो उसके चरित्र मे परिवर्तन हुआ है उस सत्ता सुख के साथ जुडी है तात्पर्य ये कि जब कोई सत्ता तक पहुंच जाता है तो वह सवर्णता वादी /मनुवादी आचरणो व्यवहारो को सहज मे ही अपना लेता है।जीवंत उदाहरण मायावती जी है -उनके तमाम सवर्ण पैर छूते हैं। उनपर लाखो के नोटो के हार चढाये जाते हैं/ उनकी मूर्तियो का निर्माण भी हो चुका है।जब ये सब हो रहा था तब सतीश मिश्रा जी उनके सलाहकार थे।उनकी हर बात उन्हे स्वीकार करनी होती थी।..मै इसे गलत नही मानता हूं।ये सामाजिक प्रक्रिया है।कभी नाव पानी पर कभी पानी नाव पर भी होता है।विकासवादी समाजशास्त्री विचारको से पता करें।..तो मित्रो हमे व्यक्तिगत आक्षेपो से अपने को और नवगीत को बचाना है।ये अगडे पिछ्डे दलित आदि विमर्शो से ऊपर उठकर रचना को समझने के लिए आवश्यक है।..जाति और समाजशास्त्र पर बहस अलग से करें-विनम्र आग्रह है।

-भारतेन्दु मिश्र
July 21 at 6:32pm

Friday, September 25, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

रमाकांत जी जरा किसी दलित बहुल गांव मे /आदर्श गांव मे जाकर देखें/जहां के प्रधान दलित हैं या उनकी पत्नियां प्रधान हैं।वे सब मनुवादी /सामंतवादी आचरण वाले हो गए हैं कि नही..यह भी देखने की बात है।तमाम ब्रहमण नेताओ को बहन जी के पांव छूते आपने न देखा हो मैने देखा है।..तो मेरा पैतृक गांव दलित बहुल है।मैने सीतापुर,ललितपुर,उन्नाव,हरदोई,लखनऊ आदि के गांव देखे हैं वहां रहा हूं नौकरी की मजबूरी से।अब सब जगह बदलाव आ चुका है कहीं कम कहीं ज्यादा।मेरा अवधी उपन्यास भी इसी तरह के चरित्रो प आया है -नईरोसनी-..खैर हर रचनाकार का अपना अनुभव क्षेत्र होता है ।केवल रायबरेली या एक जगह रहकर जाति समस्या पर या उसके आकलन पर टिप्पणी करना उचित नही है।सत्ता मिलते ही मनुष्य सामंतवादी/मनुवादी आदि हो ही जाता है।

-भारतेन्दु मिश्र
July 12 at 8:22pm 

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

बेहेतरीन नवगीत है, जो अपने सामाजिक सरोकार को जस का तस प्रस्तुत करने मे सक्षम है। रमधनिया के चरित्र का विस्तार(जिसमें उसकी प्रगति / दुर्गति भी शामिल है)हुआ है। शैलेन्द्र शर्मा जी को बधाई इस सुन्दर नवगीत के लिए ।

-भारतेन्दु मिश्र
July 11 at 5:56pm

Wednesday, September 02, 2015

एक हाथ में हल की मुठिया

तीनों नवगीत दशकों के 30 नवगीतकारों में से आधो का नाम भी लोगों को शायद न मालूम हो। शुक्ल जी सही कह रहे हैं,गीत अपने आप में कठिन साधना है और नवगीत आधुनिक समय में उस कठिन साधना के परिणाम स्वरूप उपजा नवनीत है।..अब आज के कवियों में शब्द छन्द रस अर्थ बोध के स्तर तक पहुंचने का अवकाश नहीं बचा है। युगीन सत्य को गीत में उतार पाना किसी समय में कतई सहज नहीं रहा।..हम आज कम पढ़ने वाले ज्यादा कहने वाले मंच गोंचने वाले मित्रों से रूबरू हैं और इस अकविता के नए युग में खड़े हैं।

-भारतेन्दु मिश्र
July 4 at 7:08pm

एक हाथ में हल की मुठिया

वाह व्योम जी, आप तो ऐसे ही श्रेष्ठ गीतों का खजाना दोस्तों को दिखाते रहें। मैंने सन 1984 में म.प्र. सरकार के कृषि विभाग द्वारा संकलित -धरती के लाल -शीर्षक गीत संग्रह में किसानी के गीतों में किसान जीवन के अनेक गीत पढे हैं, उसमे ..हे ग्राम देवता नमस्कार/सोने चांदी से नहीं किंतु /तुमने मिट्टी से किया प्यार ।..जैसी रचनाएँ भी थीं। संभवत:तभी कहीं इसे पढा है। तब मैं ललितपुर के जखौरा ब्लाक में प्रौढशिक्षा विभाग में पर्यवेक्षक था । लेकिन राघव जी की यह रचना है इस रूप में मुझे याद नहीं आता।..बहरहाल किसान चेतना का बेहतरीन गीत तो ये है ही। राघव जी के बारे में थोडा विस्तार कीजिए तो और अच्छा लगेगा।

-भारतेन्दु मिश्र
July 3 at 7:16pm

एक हाथ में हल की मुठिया

व्योम जी आप और कितनी धैर्य की परीक्षा लेंगे..बता ही दीजिए मुझे लगता है कि संभवत: ये रमेश रंजक जी का जनगीत हो सकता है।..मैने इसे कहीं सुना या पढा है पर याद नही

-भारतेन्दु मिश्र
July 1 at 6:30pm

Saturday, August 29, 2015

भारतेन्दु मिश्र

मैंने केदार बाबू के गीतों पर केन्द्रित जो लेख उनकी जंन्मशती के अवसर पर लिखा था (छन्दप्रसंग ब्लाग पर और प्रवक्ता डाट काम पर उपलब्ध है, उससे नचिकेता जी का आलेख कितना भिन्न है गीतगागर को पढे बिना नहीं कह सकता।


-भारतेन्दु मिश्र
June 18 at 9:15am

भारतेन्दु मिश्र

अब जब तक नचिकेता जी के उद्धरणो की पडताल न कर ली जाए कुछ कहना कठिन है।अरुन कमल जी अच्छे कवि है किंतु वे गीत /नवगीत के विचारक भी हैं यह मेरे लिए नई जानकारी है।

-भारतेन्दु मिश्र
June 17 at 8:03pm 

गीतकार मित्रों से निवेदन

गीत का मतलब फिल्मीगीत/लोक गीत/उत्सव आदि के अवसर पर लिखे जाने वाले गीत/आदि से भी जोड़ा जा सकता है किंतु नवगीत को इन सबसे नहीं जोड़ा जा सकता। माने नवगीत समग्र मानवीय चेतना या सरोकारों का अधुनातन गीत रूप है जबकि गीत प्राय: व्यक्तिपरक होता है छायावादी गीतों में यही विशेषता देखने को मिलती है और नवगीत निराला की -आराधना -में संग्रहीत गीतों के बाद से प्रारम्भ हुआ एक प्रकार का आन्दोलन/अभियान है।..यदि आज भी कोई पारम्परिक गीत लिखता है/दुहराता है, तो कोई बुराई नहीं किंतु उसे हम आधुनिक समय की दृष्टि से पिछड़ा ही मानेगे।अंग्रे्जी मे विलियम ब्लैक के गीत नवगीत की तरह दिखते हैं। संस्कृत मे राजेन्द्र मिश्र और राधावल्लभ त्रिपाठी जी के गीत नवगीत की तरह दिखाई देते हैं। हमारे यहाँ यह नवता की परंपरा स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद नवता के आरम्भ के समय से देखी जा सकती है। और भी भाषाओ मे नवगीत लिखे जा रहे हैं। अर्थात गीत यदि पिता है तो नवगीत उसका प्रगतिशील आत्मज है। तो अब आप इस नए समय मे किससे बतियाना/संवाद करना चाहेंगे।आप पर निर्भर करता है।

-भारतेन्दु मिश्र

भारतेन्दु मिश्र

ये मंचीय गीत है-लोक कथा को गीत का रूप देने की जतन की गई है। ,चमत्कारिक भाषायी प्रयोग के लिए लोग इसका खूब उदाहरण देते हैं।पूरा गीत एक तरह से -अन्धेर नगरी चौपट राजा वाली -(बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय की)चेतना का प्रतीक है।अर्थ की दृष्टि से इसमे कुछ ज्यादा नही निकलने वाला है।हां -राजा को खबर तक नही-बस ये एक पंक्ति है जो इसे नवगीत के समक्ष खडा करती है।कुछ उलटबांसियां भी इस गीत को चमत्कारी बनाती है-उल्टे मुँह हवा हो गयी
मरा हुआ साँप जी गया
सूख गये ताल-पोखरे
बादल को सूर्य पी गया..इत्यादि

-भारतेन्दु मिश्र
July 11 at 6:27pm 

भारतेन्दु मिश्र

जी व्योम जी आपने सही चिन्हित किया।कथ्य नया नहीं है, न हो किंतु पारंपरिक विषय का नवाचार /भंगिमा की नवता भी गीत को नये पाठ्य के साथ नवगीत बनाती है।

-भारतेन्दु मिश्र
July 9 at 10:16pm 

भारतेन्दु मिश्र

देखिए समीक्षा रचनाकारो को बहुत अच्छी नहीं लगती हैं। जो अच्छी लगती है वो समीक्षा नहीं होती है उसे प्रापर्टी डीलिंग जैसा कुछ समझ लें। विमर्श के लिए रचना को समझना जितना आवश्यक है उतना ही रचनाकार के लिए आवश्यक है कि वो रचना विधान की बारीकियों को समझे। सारे गीतकार/नवगीतकार एक ही जैसा क्यों सोचें..यदि सब एक जैसा लिखने लगें तो फिर मौलिकता कैसे निश्चित की जाएगी ?.विविधता ..ये नवगीत माने पाठ्यचर्या वाला गीत केवल गाये जाने वाला गीत नहीं।

-भारतेन्दु मिश्र
July 9 at 8:23pm 

भारतेन्दु मिश्र

व्योम जी, आपका प्रश्न स्वाभाविक है किंतु गीत और नवगीत के पक्ष और विपक्ष मे तर्क करने के लिए यह मंच बहुत उपयुक्त नही जान पडता क्योकि यहां हर गीतकार अपना प्रवाचक भी है तर्क पूर्ण है या नही इस का विवेक किए बिना ही।इसके मै पहले भी मनोज जैन की पुस्तक पढ चुका हूं और टिप्पणी भी कर चुका हूं।रही बात इस गीत के नवगीत होने या न होने की तो ये फेसबुक की एक टिप्पणी मे समझाना सहज नही होगा।कभी अवसर मिले तो इसी विषय पर विस्तार से मित्रो से चर्चा की जा सकती है। यहां गंभीर विवेचन कर पाना संभव नही है।किसी एक लक्षण से कोई गीत नवगीत नही हो जाता।नवगीत का रचनाविधान है जिस पर विस्तार से बात की जा सकती है।अधिकृत विद्वानो से बहस /परिचर्चा की जानी चाहिए।उपयुक विद्वानो के साक्षात्कार आदि भी होने चाहिए।बात एक मनोज जैन के नवगीत /गीत की नही है।आपने देखा कि मनोज जैन स्वय्ं ही दुविधा मे हैं..ये दुविधा अनेक गीतकारो/नवगीतकारो मे होती है।

-भारतेन्दु मिश्र 
July 9 at 7:52pm 

भारतेन्दु मिश्र

वधाई मनोज जी,अच्छे नवगीत के लिए आपतो मेरे प्रिय नवगीतकार हैं।

-भारतेन्दु मिश्र
July 9 at 8:34am

भारतेन्दु मिश्र

राजेन्द्र भाई आप सही कह रहे हैं किंतु ये विमर्श शुक्ल जी पर केन्द्रित न हो कर नवगीत पर केन्द्रित है।इस मंच का नाम ही नवगीत विमर्श है।अब शुक्ल जी इसे यदि अपने गीत से अलग करके नही देख रहे तो इसमे क्या किया जाए ?मैने एक भी शब्द उनके लिए नही कहा है। इस गीत रचना के बारे में जो सही लगा बस वही कहा है।किंतु यदि शुक्ल जी को कहीं मेरे किसी शब्द से कष्ट पहुंचा है तो उसके लिए खेद है(हालांकि समीक्षा मे खेद व्यक्त करना भी उचित नही है) वे मेरे लिए आदरणीय हैं। किंतु यह भी सच है कि तमाम मंचीय आत्ममुग्ध लोग(जिन्हे मैने छिले हुए कन्धे वाले कह्ने की ओर संकेत किया है ) लगातार अपने गीतो को नवगीत साबित करने की योजना मे लगे रहे हैं। मैने भी कई गीत और नवगीत लिखे हैं।अनुभव की सीढी मे भी कई गीत और नवगीत एकत्र संकलित भी हैं।..मेरी समझ से किसी भी प्रकाशित हो चुकी रचना पर बात करना व्यक्ति पर बात करना नही होता है।..आप सब नही चाहते हैं तो इस गीत पर मेरी ओर से बात समाप्त।

-भारतेन्दु मिश्र
July 5 at 6:29am

भारतेन्दु मिश्र

जी राजेन्द्र जी दोनों एक कुल गोत्र के होते हुए भी एक कैसे हो सकते हैं। दोनों की धमनियों में प्रवाहित रक्त ,नाक -नक्श, आवाज-,आचरण -व्यवहार आयु -विचार आदि एक ही नहीं हो सकते।..लेकिन कुछ मित्र गीत को ही नवगीत साबित करने में हलाकान हुए जा रहे हैं और अपना कन्धा छिलवाए ले रहे हैं।..तो समझदारी से स्वीकार करना चाहिए किए दोनों आलग है।

-भारतेन्दु मिश्र
July 4 at 7:42pm

भारतेन्दु मिश्र

जी आपने सही किया। किंतु इसी बहाने नवगीत और गीत का फर्क समझने वाले मित्रों / किसी मित्र को भी आप और हम सही दिशा दे सकते हैं। मेरा लक्ष्य आपके गीत की समीक्षा के साथ ही इस अंतर को भी दोस्तो के सामने रखना था।आप तो नवगीत पर लगातार काम करते आ रहे हैं। आपकी समझ पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहा हूँ। उत्तरायण के अंक नवगीत की समझ को विकसित करने में लगातार अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं। लेकिन पिता और पुत्र में जो नाम गुण विचार आदि के तमाम अंतर होते हैं, वे सब गीत और नवगीत मे भी हैं।

-भारतेन्दु मिश्र
June 23 at 7:11pm · Unlike · 4

भारतेन्दु मिश्र

सुन्दर शृंगार गीत है बधाई। लेकिन यह नवगीत नही हैं। श्रंगार एक प्रकार से नैसर्गिक सनातन मूल्य है और इस विषय वस्तु पर अब से पहले करोडों की संख्या मे गीत लिखे जा चुके हैं। नवगीत विमर्श में परंपरा में भी नवता का अनिवार्य आग्रह होता है। यदि वह नहीं दिखाई देता है तो उसे हम नवगीत कैसे कहेंगे। इस गीत की भाषा भी छायावादी काव्य भाषा से आगे बढ़ी हुई नहीं दिखती है। आदरणीय शुक्ल जी का सम्मान करते हुए असहमत हूं। शुक्ल जी श्रेष्ठ नवगीतकार है लेकिन उनका यह गीत नवगीत नहीं लगता। इससे नई पीढी के नवगीतकारो में भ्रम पैदा न हो केवल इसलिए यह टिप्पणी कर रहा हूं।

एक गीत यह भी....
सागर की प्यास...
बेसुध हैं
रोम रंध्र
विकल मनाकाश
मैं ठहरा
तुम ठहरे
सागर की प्यास
चंदा की कनी कनी
चंदन में सनी सनी
हौले से उतर आई
आंगन में छनी छनी
मैं भीगा
तुम भीगे
सारा अवकाश
मेंहदी के पात पात
रंग लिए हाथ हाथ
चुपके से थाप गये
सेमर के गात गात
मैं डूबा
तुम डूबे
आज अनायास
सांसो की गंध गंध
मदिर मदिर मंद मंद
जाने कब खोल गए
तार तार बंध बंध
मैं भूला
तुम भूले
सारा इतिहास

-निर्मल शुक्ल.......
२३ जून २०१५.