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Sunday, September 27, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

आप या मैं कुछ भी कहें पर उसके पीछे वस्तुनिष्ठता होनी चाहिए ...कवि शायद कहना चाह रहा है कि माया आते ही नाम सम्बोधन बदल जाते हैं सत्ता मिलते ही आदमी वही करने लगता है जिसके लिये वह दूसरों को कोसता है ....
-वेद शर्मा
July 19 at 8:54pm

Friday, September 25, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत


यादव जी यह तो व्यंग है और सत्ता का चरित्र उघरता है......मुझे नहीं लगता कोई भी सच्चा रचनाकार सवर्ण या कुछ और होता वह केवल मूल्यों के साथ खड़ा होता है।

-वेद शर्मा
July 19 at 7:45pm

योगेन्द्र दत्त शर्मा का नवगीत

आदरणीय यादव जी कविता गद्य तो नहीं होती कवि जिस लय को पाना चाहताहै वह है कहाँ पात्र बदलते हैं पर मूल्य ?...स्थितियां इतने समय बाद भी .....शिल्प शब्द चयन कहन अपनी टिप्पणी पर फिर से विचार करें इस तरह के गीत आजकल गिने चुने लोग ही लिख रहे हैं/ लिख सकते हैं ........
-वेद शर्मा