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Friday, September 25, 2015

योगेन्द्र दत्त शर्मा का नवगीत

सुंदर और सामयिक पर,आत्मा शब्द की जगह कुछ और होता तो खटकती नही लय ! शेष क्षमा यदि कुछ गलत कहा !
-रंजना गुप्ता

Wednesday, September 02, 2015

एक हाथ में हल की मुठिया


बिलकुल ठेठ ग्राम्य सौंदर्य बोध से प्लावित नवगीत ! रचियता का नाम जानना चाहूँगी

-रंजना गुप्ता
July 1 at 7:01pm

Saturday, August 29, 2015

रंजना गुप्ता

बिलकुल सच कहा !जिस तरह आधुनिक पेन्टिंग को समझने के लिए एक जटिल व कृत्रिम बौद्धिकता और वाहियात समझ की जरूरत है, उसी भांति आज की बड़ी बड़ी साहित्यिक हिन्दी पत्रिकायें दुरूह और पहेली संरचना की कविताएँ छाप क्र जनता के सरोकारों से पूरी तरह विमुख है ! उन्होंने तो नारी और काम पर कामशास्त्र को भी पानी पिला रखा है,और आलोचक पूरी तरह जुगाड़ू ,पक्षपाती , स्वजन हितैषी ,पेड न्यूज चैनल बन गए है!

-रंजना गुप्ता
June 8 at 1:02pm